RBSE Class 8 Hindi रचना निबन्ध-लेखन

Rajasthan Board RBSE Class 8 Hindi रचना निबन्ध-लेखन

1. मोबाइल का बढ़ता प्रचलन
प्रस्तावना:
मोबाइल फोन आज की दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण अंग बन चुका है। जिसे देखो वह मोबाइल पर बात करता हुआ दिखाई पड़ता है। यह एक छोटा सा इलेक्ट्रॉनिक उपकरण है। इसके माध्यम से हम अपने संदेशों को बोलकर या लिखकर दूसरे लोगों तक पहुँचा सकते हैं। आधुनिक मोबाइल फोनों के द्वारा हम किसी भी रंगीन फोटो या वीडियो को भी दूसरों तक पहुँचा सकते हैं। वीडियो कॉलिंग के द्वारा मोबाइल फोन से दो लोग ऐसे ही बात कर लेते हैं, जैसे लोग आमने सामने बैठ कर बात करते हैं।

मोबाइल फोन का उपयोग:
आज मोबाइल फोन का दिनों-दिन प्रचलन बढ़ रहा है और इसका उपयोग रातदिन बातचीत करने और सन्देश भेजने में तो होता ही है। इसके साथ ही इसका उपयोग बैंकिंग क्षेत्र में, नौकरी के क्षेत्र में, सूचना और समाचार-प्रेषण के क्षेत्र में कला के क्षेत्र आदि में भी धड़ल्ले से हो रहा है। इस प्रकार आज की आपाधापी वाली जिन्दगी में मोबाइल फोन एक अच्छा साथी सिद्ध हो रहा है।

मोबाइल फोन से हानियाँ:
आज मोबाइल फोन आम जिन्दगी का हिस्सा बन गया है जिस कारण विश्व की 1 दूरियाँ समाप्त हो गयी है। लेकिन इससे होने वाली प्रमुख हानियाँ इस प्रकार हैं-

  1. आज मोबाइल फोन का अत्यधिक प्रयोग मानवीय सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए घातक सिद्ध हो रहा है।
  2. इसका अत्यधिक प्रयोग युवा पीढ़ी के मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गया है। इससे व्यक्ति को ठीक से नींद नहीं आती, उसकी याददाश्त पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है।
  3. मोबाइल फोन के उत्पादन से पर्यावरण प्रदूषित होता है।
  4. साथ ही यह भावी पीढ़ी के लिए भी एक बड़ा खतरा है।। उपसंहार-मोबाइल फोन एक संसाधन है। इसका हमें अत्यधिक उपयोग नहीं होना चाहिए। सीमित उपयोग करने पर ही यह हमारे लिए वरदान सिद्ध हो सकता है।

2. स्वच्छता का जीवन में महत्त्व
अथवा
स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत
अथवा
स्वच्छ भारत अभियान
अथवा
स्वच्छता ही जीवन है।

प्रस्तावना:
स्वच्छता का अर्थ साफ-सफाई से है। साफसफाई से रहना मनुष्य जीवन के लिए, अति आवश्यक है। इसीलिए हम रोज सुबह उठकर नहाने-धोने का काम करते। हैं और माताएँ-बहनें घर-बाहर झाड़ने-बुहारने का काम करती हैं। क्योंकि इसके पीछे हमारी ‘नीरोगी काया’ बनाये रखने की अवधारणा ही तो है।

स्वच्छ भारत अभियान व घोषणा:
स्वच्छता का भाव हमारे जीवन से जुड़ा हुआ है। इसी भाव के प्रति जागरूकता लाने के लिए हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रव्यापी ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का औपचारिक शुभारम्भ 2 अक्टूबर, 2014 को गाँधी जयन्ती के. शुभ अवसर पर नई दिल्ली में एक वाल्मीकि बस्ती में झाडू लगाकर किया और स्वतन्त्रता दिवस 2014 को लाल किले की प्राचीर से स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा की थी। स्वच्छता आन्दोलन का आह्वान-प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने स्वच्छता आन्दोलन का आह्वान करते हुए सन्देश रूप में कहा कि हम मातृभूमि की स्वच्छता के लिए अपने आप को समर्पित कर दें।

इसके लिए सभी देशवासी प्रत्येक सप्ताह दो घण्टे अर्थात् प्रतिवर्ष लगभग सौ घण्टे का योगदान करें। इसके साथ ही धार्मिक और राजनीतिक नेताओं, महापौरों, सरपंचों व उद्योगपतियों से अपील करते हुए उन्होंने कहा कि वे शहरों, आसपास के क्षेत्रों, गाँवों, कार्य-स्थलों तथा घरों की स्वच्छता की कार्य-योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करने में जुट जाएँ। इसके लिए उन्होंने प्रत्येक ग्राम पंचायत को 2020 लाख रुपये सालाना अनुदान देने की भी घोषणा की और |ग्रामीण क्षेत्रों में 11.11 करोड़ शौचालयों के निर्माण के लिए 11.34 लाख करोड़ की मंजूरी प्रदान कर दी।

उपसंहार:
स्वच्छता ही जीवन है। स्वच्छ रहना हमारा अनिवार्य कर्म और धर्म है। इसलिए हमें स्वच्छ रहना चाहिए तथा ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में अपनी सहयोगात्मक दृष्टि से पूर्ण भागीदारी निभानी चाहिए। इससे हम स्वच्छता का जीवन में महत्त्व आसानी से समझ सकेंगे और हम स्वयं स्वच्छ रह सकेंगे तथा अपने देश को |भी स्वच्छ बना सकेंगे।

3. बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ
प्रस्तावना:
वर्तमान काल में अनेक कारणों से मानवता कलंकित हो रही है। कुछ दकियानूसी सोच वाले लोग बेटा या पुत्र को कुलदीपक और बुढ़ापे की लाठी मानते हैं, तो बेटी को मुसीबतं की जड़ समझते हैं। ऐसे ही लोग कन्या-जन्म को अशुभ मानते हैं। न चाहने पर भी यदि बेटी हो गई, तो उसे उपेक्षा से पालते हैं और घर के कार्यों में लगाकर अशिक्षित रखते हैं।

सामाजिक चेतना का प्रसार:
इसी दकियानूसी सोच के कारण ऐसे ही लोग घर में कन्या को जन्म नहीं देना चाहते हैं। वे चिकित्सकीय साधनों से गर्भावस्था में लिंग-परीक्षण करवाकर कन्या भ्रूण नष्ट करने का नृशंस पाप करते हैं। इसका कुपरिणाम यह दिखाई दे रहा है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की संख्या में अन्तर आ गया है। लिंगानुपात की इस बिगड़ती स्थिति को देखकर तथा समाज की गलत मानसिकता को लेकर सरकार का चिन्तित होना स्वाभाविक है। समाज का सही विकास हो, लोगों में नयी चेतना का प्रसार हो, इस दृष्टि से सरकार ने ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा दिया है। साथ ही सरकार लिंग परीक्षण को प्रतिबन्धित कर, कन्याजन्म और उसकी शिक्षा-व्यवस्था पर पूरा ध्यान दे रही है। अभियान एवं उद्देश्य-‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के सम्बन्ध में हमारे राष्ट्रपति ने लोकसभा के दोनों सदनों को संयुक्त रूप से जून, 2014 को सम्बोधित किया। जिसमें बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, उनका संरक्षण और सशक्तीकरण किया जाए, पर जोर दिया गया। इस अभियान का प्रचार विभिन्न माध्यमों से प्रोत्साहित करना सरकार का प्रमुख उद्देश्य है। इसका परिणाम अब दृष्टिगत होने लगा है।

उपसंहार:
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान के माध्यम से हमारे समाज में जागरूकता के साथ ही रूढ़िवादी सोच में भी परिवर्तन आने लगा है। वह दिन अब दूर नहीं है जब बेटियों को समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त होगा।

4. विद्यार्थी और अनुशासन
अथवा
जीवन में अनुशासन का महत्त्व
अथवा
अनुशासन : एक वरदान

प्रस्तावना:
‘अनुशासन’ शब्द ‘अनु’ और ‘शासन’ इन दोनों शब्दों के मेल से बना है।’अनु’ का अर्थ पीछे या अनुकरण करना तथा ‘शासन’ का आशय व्यवस्था या नियन्त्रण करना है। इस प्रकार स्वयं को नियम के अनुसार ढालना, व्यवस्था का पालन करना तथा अपने आचरण पर नियन्त्रण रखना। ‘अनुशासन’ कहलाता है।

अनुशासन का महत्त्व:
अनुशासन का मानव जीवन में विशेष महत्त्व है। अनुशासन केवल विद्यार्थियों के लिए ही नहीं प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है। विद्यार्थी जीवन में यह अति महत्त्वपूर्ण है। इसमें रहकर ही विद्यार्थी जीवन में आगे बढ़ सकता है। अपना शारीरिक और बौद्धिक विकास कर सकता है। लेकिन आज जो विद्यार्थियों और कर्मचारियों में अनुशासनहीनता बढ़ रही है वह सोचनीय

अनुशासनहीनता के कारण:
हमारे देश में अनुशासनहीनता के अनेक कारण हैं। हमारी दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के बीच मधुर सम्बन्धों का अभाव, कर्मचारियों एवं अधिकारियों में स्वार्थी भावना और कर्तव्यनिष्ठा का अभाव, राजनीति में भ्रष्टाचार व स्वार्थी प्रवृत्ति का बोलबाला आदि अनेक ऐसे कारण हैं, जिनसे हमारे सारे समाज और राष्ट्र का वातावरण दूषित हो रहा है। इन सभी कारणों से हमारे छात्र, युवा एवं समाज के अन्य लोग अनुशासन से रहित हो रहे हैं। वे स्वतन्त्रता का अर्थ स्वेच्छाचरण मानकर अनुशासन का पालन नहीं कर रहे हैं।

अनुशासनार्थ सुझाव:
अनुशासन अपनाने हेतु महत्त्वपूर्ण सुझाव के रूप में प्रत्येक नागरिक में कर्तव्य-भावना का जागरण होना चाहिए। हमें हमारे महापुरुषों तथा आदर्श व्यक्तियों का। चारित्रिक विकास की दृष्टि से अनुकरण करना चाहिए। उपसंहार-अनुशासन एक ऐसी प्रवृत्ति या संस्कार है, जिसे अपनाकर प्रत्येक व्यक्ति अपना जीवन सफल बना सकता है। अनुशासित रहकर प्रत्येक छात्र, प्रत्येक कर्मचारी। और प्रत्येक नागरिक अपनी तथा देश की प्रगति में सहायक हो सकता है।

5. आदर्श विद्यालय
प्रस्तावना:
विद्यालय माँ सरस्वती का पावन मन्दिर है, जहाँ हम विद्यार्थियों के सुभविष्य का निर्माण होता है। विद्यालय में शिक्षक और शिक्षार्थी होते हैं जिनके संबंध मधुर होते हैं। हमारा विद्यालय एक आदर्श विद्यालय है। मुझे अपने विद्यालय पर गर्व है।

विद्यालय की स्थिति व भवन:
हमारा विद्यालय शहर से बाहर शान्त वातावरण में स्थित है। इसका भवन अत्यन्त सुन्दर और विशाल है। इसमें पन्द्रह बड़े-बड़े कमरे हैं। विद्यालय में पुस्तकालय कक्ष के साथ-साथ खेल-कूद कक्ष, अध्यापक कक्ष व पोषाहार कक्ष हैं। विद्यालय में पेड़-पौधे लगे हुए हैं। विद्यालय के प्रत्येक कमरे में पंखे लगे हुए हैं।

विद्यालय का वातावरण:
विद्यालय का वातावरण विद्यार्थियों के अनुकूल है। जिस समय कक्षाओं का संचालन होता है, उस समय पूरे विद्यालय प्रांगण में शान्ति समायी रहती है। खेल-कूद हेतु विद्यार्थी कक्षा से निकल पंक्तिबद्ध होकर खेल के मैदान में जाते हैं। इसके साथ ही हमारे ‘सरस्वती विद्या मन्दिर’ में प्रधानाध्यापक सहित पन्द्रह शिक्षक और तीन सहायक कर्मचारी हैं। सभी शिक्षक विषय के विद्वान हैं। वे पाठ को अच्छी तरह से समझाते हैं। वे विद्यार्थियों के साथ मधुर व्यवहार करते हैं।

विद्यालय के प्रधानाध्यापक:
हमारे ‘सरस्वती विद्या मन्दिर’ के प्रधानाध्यापक कुशल प्रशासक, अनुशासन-प्रिय, विद्वान और सज्जन व्यक्ति हैं। वे कक्षाओं का निरन्तर पर्यवेक्षण करते रहते हैं। आने वाले वे सभी के साथ मधुर व्यवहार करते हैं। उपसंहार-विद्यालय विद्यार्थियों के भावी जीवन निर्माण की आधारशिला होता है। वह विद्यार्थियों को पढ़ाने के साथ नैतिक शिक्षा भी देता है उनका चरित्र निर्माण भी करता है। हमारे आदर्श विद्यालय में ये सभी शिक्षाएँ दी। जाती हैं। हम अपने आदर्श विद्यालय को प्रणाम करते हैं।

6. वायु प्रदूषण
प्रस्तावना:
वायु-मण्डल पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। मानव जीवन के लिए वायु का होना आवश्यक है। प्राणदायिनी वायु आक्सीजन यदि शुद्ध नहीं होगी तो वह प्राण देने की बजाय प्राण ही हर लेगी। पुराने समय में आज की तरह मनुष्य के सामने वायु प्रदूषण जैसी समस्या नहीं थी, क्योंकि उस समय वनों व वृक्षों की कटाई नहीं। होती थी। लेकिन आज मनुष्य अपने लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट करने में लगा हुआ है जिससे वायु प्रदूषण बढ़ने लगा है।

वायु प्रदूषण के कारण:
वायु प्रदूषण बढ़ने के अनेक कारण हैं। आज-कल जैसे-जैसे शहरीकरण और औद्योगीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे शुद्ध वायु भी मिलना दूभर होती जा रही है। आज बड़े-बड़े कारखानों की चिमनियों से धुआँ व गैस बड़ी मात्रा में निकलती है और वायुमण्डल में फैलती है। मोटरगाड़ियों के दूषित धुएँ के कारण वायु में जहरीले तत्त्व मिल जाते। हैं। सड़कों के किनारे, गलियों एवं खुले स्थानों पर गन्दे जल-मल के कारण वायु-प्रदूषण बढ़ता है। वनों व वृक्षों की कटाई के कारण भी वायु प्रदूषण बढ़ रहा है।

वायु प्रदूषण को रोकने के उपाय-

  1. वायु प्रदूषण को रोकने के लिए कारखानों को शहरी क्षेत्र से दूर स्थापित किया जाना चाहिए।
  2. जनसंख्या वृद्धि को रोकने का सफल प्रयास किया जाना चाहिए।
  3. शहरीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए गाँव व कस्बों में रोजगार के साधन उपलब्ध कराये जाने चाहिए।
  4. वाहनों से धुआँ कम निकलने का प्रबंध किया जाना चाहिए।
  5. वनों व वृक्षों की कटाई रोकी जानी चाहिए।
  6. साथ ही समाज को वायु प्रदूषण के दुष्परिणामों के प्रति सचेत किया जाना चाहिए।

उपसंहार:
वायु प्रदूषण मानव जीवन के लिए अति घातक है। जब हमें ऑक्सीजन के रूप में शुद्ध वायु ही नहीं मिलेगी तब जीवन की कल्पना कैसे की जा सकती है। इसलिए वायु प्रदूषण को रोकने के लिए कठोर नियम बनाए जाने चाहिए। और पेड़-पौधे लगाने की अनिवार्यता की जानी चाहिए।

7. मेरा प्रिय खेल
प्रस्तावना:
मनुष्य स्वभाव से ही खेलप्रिय रहा है। वह अपनी मानसिक थकान को मिटाने के लिए खेल भी खेलता है। खेल खेलने से मन और शरीर दोनों ही स्वस्थ रहते हैं। मेरा प्रिय खेल क्रिकेट’ है, जिसे मैं खेलता हूँ।

मैदान एवं खिलाड़ी:
क्रिकेट आज का सबसे लोकप्रिय खेल है। बड़े मैदान में इस खेल की पिच बाईस गज लम्बी होती है। उसके दोनों किनारों पर तीन-तीन विकटें जमीन में गाड़ी हुई होती हैं। इस खेल में दो टीमों में मैच होता है। प्रत्येक टीम में ग्यारह-ग्यारह खिलाड़ी होते हैं। प्रत्येक टीम की अपनी-अपनी पोशाक होती है। खेलने के प्रमुख साधन बैट और बॉल होते हैं।

खेल खेलना:
दोनों दल खेल के मैदान में एकत्र होते हैं। खेल का प्रारम्भ ‘टॉस’ से होता है। जिस टीम का कप्तान ‘टॉस’ जीत जाता है, उससे अम्पायर पूछता है कि आप पहले ‘बैटिंग’ करेंगे या ‘फील्डिंग’। उसकी जो इच्छा होती है, ‘बैटिंग’ और ‘फील्डिंग’ में से किसी एक को चुन लेता है। अब टीमें दो रूपों में बँट जाती हैं। एक बैटिंग करने वाली टीम और दूसरी फील्डिंग करने वाली टीम। बैटिंग करने वाली टीम रन बनाती है और फील्डिंग करने वाली टीम उन्हें रन बनाने से रोकती है। दोनों टीमें खेलकर जो टीम ज्यादा रन बना लेती है, वह टीम विजयी घोषित कर दी जाती है।।

उपसंहार:
क्रिकेट अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आज का सबसे लोकप्रिय खेल है। इस खेल को खेलने से जहाँ शरीर स्वस्थ रहता है, वहीं मानसिक और शारीरिक विकास भी होता है। इसलिए यह मेरा प्रिय खेल है। मेरी इच्छा है कि मैं भी इस खेल को खेल कर अपने माता-पिता तथा देश के नाम को रोशन करूं।

8. यदि मैं भारत का प्रधानमन्त्री होता
प्रस्तावना;
प्रत्येक व्यक्ति अपने मन में सुनहरे भविष्य की कल्पना करता है। इसी दृष्टि में हमारे देश की लोकतन्त्र प्रणाली में यदि मैं चुनाव जीत कर लोकसभा का सदस्य बन जाता और सभी प्रतिनिधि मुझे देश का प्रधानमंत्री चुन लेते तो कितना अच्छा होता।

देश का प्रधानमन्त्री बनना:
यदि मैं अपनी कल्पना के अनुसार देश का प्रधानमंत्री बन जाता, तो मैं योग्य, ईमानदार व्यक्तियों को ही अपने मन्त्रिमण्डल में शामिल करता और उन्हें सेवाभाव के साथ जनता व देश की समस्याओं और आकांक्षाओं को समझने और पूरा करने के लिए कहता।

प्रधानमन्त्री बनने पर मेरे कर्तव्य:
यदि मैं देश का प्रधानमन्त्री होता तो निम्नलिखित कर्तव्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने की कोशिश करता–

  1. मैं देश की विदेश नीति |को प्रभावशाली बनाता तथा रक्षा-सेनाओं पर अधिक धन व्यय करता।
  2. देश की आर्थिक प्रगति के लिए प्रयास करता।
  3. लघु-उद्योगों तथा ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देता।
  4. देश में शिक्षा के स्तर को सुधारता तथा व्याप्त बेरोजगारी को दूर करता।
  5. देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करता, गरीबी को मिटाता।
  6. आतंकवाद, साम्प्रदायिक भावना को जड़ से समाप्त करता।
  7. कृषि उत्पादन में वृद्धि के उपायों पर जोर देता।
  8. महँगाई, लालफीताशाही को हरसम्भव दूर करने का प्रयास करता।
  9. देश को शक्तिशाली बनाने में हरसंभव प्रयास करता।

उपसंहार:
इस प्रकार यदि मैं प्रधानमन्त्री होता तो अपने देश की उन्नति के लिए तन, मन और जीवन समर्पित करता। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह मेरी इसे कल्पना को भविष्य में अवश्य ही पूरी करे।

9. कम्प्यूटर शिक्षा
अथवा
कम्प्यूटर शिक्षा का महत्त्व
अथवा
कम्प्यूटर शिक्षा की आवश्यकता

प्रस्तावना:
अंग्रेजी की ‘कम्प्यूट’ क्रिया से ‘कम्प्यूटर शब्द बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है, संगणक या गणनाकार। टेलीविजन के आविष्कार के बाद गणितीय कार्य की जटिलता को ध्यान में रखकर ‘कम्प्यूटर’ का आविष्कार किया गया।

कम्प्यूटर शिक्षा का प्रसार:
कम्प्यूटर एक ऐसा यंत्र है जो अति तीव्रगति से गणितीय प्रोसेसिंग करता है। इसकी गति की। माप माइक्रो सेकण्ड में की जाती है। इसी कारण कम्प्यूटर को आविष्कार होते हुए कम्प्यूटर शिक्षा का पाठ्यक्रम बनाकर शिक्षा का प्रसार तेजी से किया गया।

कम्प्यूटर का विविध क्षेत्रों में उपयोग:
कम्प्यूटर शिक्षा के प्रसार के बाद कम्प्यूटर का विविध क्षेत्रों में प्रयोग धड़ल्ले के साथ होने लगा। कम्प्यूटर से टेलीविजन चैनलों के मनपसन्द प्रसारण देखे जा सकते हैं। मनपसन्द फिल्म की रिकार्डिंग की जा सकती है। इसी प्रकार रेल, बस, हवाईजहाज के टिकटों का वितरण-आरक्षण किया जा सकता है। पानीबिजली-टेलीफोन के बिलों, परीक्षा-परिणामों का संगठनप्रतिफलन करने के अलावा अन्य अनेक कार्यों में इसका उपयोग सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

कम्प्यूटर शिक्षा से लाभ:
जैसाकि कम्प्यूटर की विविध क्षेत्रों में उपयोगिता ऊपर दिखाई गई है, यह सब कम्प्यूटर शिक्षा से ही सम्भव है। कम्प्यूटर शिक्षा से जटिलतम प्रश्नों एवं समस्याओं का हल आसानी से हो जाता है। इसके साथ ही व्यावसायिक क्षेत्र की सफलता के लिए कम्प्यूटर शिक्षा का ज्ञान अति आवश्यक बन गया है। इसी से दूरस्थ शिक्षा तथा ऑनलाइन एजूकेशन के अलावा इन्टरनेट के कार्यक्रम आसानी से चल रहे हैं।

उपसंहार:
कम्प्यूटर शिक्षा का आज के जमाने में सर्वाधिक महत्त्व है। आज इसकी सभी क्षेत्रों में उपयोगिता बढ़ रही है।

10. संचार क्रान्ति : इन्टरनेट
अथवा
युवाओं में इंटरनेट का बढ़ता प्रचलन

प्रस्तावना:
वर्तमान में सूचना एवं दूर संचार प्रौद्योगिकी का असीमित विस्तार हो रहा है। इसी आधार पर कम्प्यूटर एवं सेल फोन सूचना एवं मनोरंजन का एक सुन्दर साधन बन गया है जिसे इन्टरनेट कहते हैं।

इन्टरनेट प्रणाली:
यह ऐसे कम्प्यूटरों एवं सेल फोनों का अन्तर्जाल है जो सूचना आदान-प्रदान करने के लिए आपस में जुड़े रहते हैं। जिसे हम इन्टरनेट के नाम से जानते हैं। इन्टरनेट संसार में व्याप्त सूचना भण्डारों को आपस में जोड़कर उन्हें किसी भी स्थान पर उपलब्ध कराये जाने की आधुनिक संचार विधि है।

इन्टरनेट की रचना एवं कार्यविधि:
इन्टरनेट विश्वभर में। फैला एक नेटवर्क है। इसमें भी वही सेवाएँ होती हैं जो किसी शहर में मिलती हैं। यदि आपको अपनी मेल भेजनी या प्राप्त करनी है तो इस कार्य को करने के लिए इन्टरनेट में इलेक्ट्रोनिक पोस्ट ऑफिस होते हैं। इसमें ऑनलाइन लाइब्रेरी होती है। इसी प्रकार हम इन्टरनेट से जो सूचना चाहें वह जान सकते हैं, मित्रों से बात कर सकते हैं। चीजों को खरीद बेच सकते हैं। समस्त संसार के कम्प्यूटरों में समाहित विविध प्रकार की सूचना सामग्री को w.w.w. (वर्ल्ड वाइड वेब) कहा जाता है। इन्टरनेट में शामिल होने के लिए अपनी वेबसाइट बनानी पड़ती है।

उपयोग एवं दुरुपयोग:
इन्टरनेट से घर बैठे ही बटन दबाते ही चाही गई सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जा सकता है। इसलिए यह आज हमारे लिए अति उपयोगी है। स्थिति यह है कि युवाओं में इंटरनेट का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है। वे आधुनिक जीवन से जुड़ी किसी भी स्थिति या समस्या का निदान घर बैठे इन्टरनेट के माध्यम से सहजता से कर लेते हैं। इससे समय व धन दोनों की बचत हो जाती है। इसके साथ ही इस नेटवर्क ने अपराध जगत में ‘साइबर अपराधी की एक नयी फौज दुरुपयोग की दृष्टि से खड़ी कर दी है।

उपसंहार:
विज्ञान के इस युग में नये-नये आविष्कार मानव हित की दृष्टि से किए जाते हैं वहीं इन आविष्कारों से लाभ के साथ हानियाँ भी जुड़ी रहती हैं। इसलिए युवाओं को चाहिए कि वे इसका सदुपयोग करें।

11. स्वतन्त्रता दिवस (15 अगस्त)
अथवा
राष्ट्रीय पर्व : स्वतन्त्रता दिवस

प्रस्तावना:
हमारे देश भारत में अनेक पर्व-त्योहार मनाये जाते हैं। पन्द्रह अगस्त हमारा ऐसा ही राष्ट्रीय पर्व है, क्योंकि सन् 1947 में इसी दिन हमारा देश विदेशी सत्ता की दासता से मुक्त होकर आजाद हुआ था। अतः इस पर्व को ‘स्वतन्त्रता दिवस’ के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है।

मनाने का कारण:
15 अगस्त, 1947 ई. को हमारे भारत को स्वतन्त्रता मिली थी। हम सब अपने तिरंगे झण्डे के नीचे एकत्र होकर स्वतन्त्रता की श्वास लेने लगे। इस स्वतन्त्रता के लिए हमारे वीर देशभक्तों ने एक लम्बा संघर्ष किया। इस संघर्ष में अनेक देशभक्त शहीद हुए तब हमें मिली आजादी। इसी आजादी के दिन यह राष्ट्रीय पर्व मनाया जाता है।

विविध कार्यक्रम:
इस राष्ट्रीय पर्व को सरकार और जनता प्रतिवर्ष बड़े धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन राजधानी दिल्ली में लालकिले की प्राचीर पर प्रधानमन्त्री द्वारा तिरंगा फहराया जाता है और प्रेरणादायी भाषण देते हैं। सन्ध्या को सभी सरकारी भवनों, संसद भवन तथा राष्ट्रपति भवन पर रंगबिरंगी रोशनी की जाती है। इसी प्रकार राज्यों की राजधानियों, जिला मुख्यालयों और शिक्षण संस्थाओं में ध्वजारोहण, सलामी, भाषण तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं।

उपसंहार:
प्रतिवर्ष स्वतन्त्रता दिवस का आयोजन कर हम राष्ट्र की एकता और अखण्डता का संकल्प लेते हैं। शहीदों को याद करते हैं। हमें इस पर्व पर देश की प्रगति के लिए प्रतिज्ञा करनी चाहिए।

12. यदि मैं शिक्षक होता

प्रस्तावना:
मनुष्य एक सचेतन प्राणी है। इसलिए उसके मन में कुछ न कुछ आकांक्षाएँ जन्म लेती रहती हैं। मेरे मन में भी आकांक्षा है कि यदि मैं शिक्षक होता तो क्या करता?

आदर्श अध्यापक का स्वरूप:
यदि मैं शिक्षक होता तो मैं एक आदर्श शिक्षक बनने का ही प्रयास करता। क्योंकि शिक्षक विद्यार्थियों और समाज के लिए हर दृष्टि से आदर्श होता है। उसके प्रत्येक कार्य प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से शिक्षार्थी और समाज पर प्रभाव डालते हैं। मैं अपने और अपने व्यवहार को ऐसा बनाता जिसका अनुकरण मेरे विद्यार्थी कर सकते और समाज प्रभावित हो सकता।

छात्रों का मार्गदर्शक:
यदि मैं शिक्षक होता तो मैं शिक्षार्थियों की पढ़ाई पर पूरा ध्यान देता। इस बात की सोच रखता कि उनके उज्ज्वल भविष्य का निर्माण मेरे हाथ में है। उनके साथ पुत्रवत् व्यवहार करता। मैं गरीब शिक्षार्थियों की हर तरह से सहायता करता।

उपसंहार:
शिक्षक देश के भावी नागरिकों का निर्माता होता है। यदि मैं अध्यापक होता तो मैं एक आदर्श शिक्षक के गुणों को अपनाकर अपने दायित्वों को अच्छी तरह संभालता। हमारे लिए हमारा छात्र ही सब कुछ होता।

13. दीपावली
अथवा
दीपों का त्योहार : दीपावली
अथवा
मेरा प्रिय त्योहार
अथवा
प्रकाश पर्व : दीपावली

प्रस्तावना:
हमारे देश में प्रतिवर्ष अनेक त्योहार मनाये जाते हैं। जैसे रक्षाबन्धन, दशहरा, दीपावली और होली। इनमें भी दीपावली प्रमुख त्योहार है।

मनाने का समय:
यह त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। यह त्योहार अमावस्या के दो दिन पूर्व त्रयोदशी से लेकर इसके दो दिन बाद तक चलता है। इस प्रकार यह त्योहार पाँच दिनों तक मनाया जाता है।

मनाने का कारण:
इस त्योहार के साथ हमारी अनेक पौराणिक तथा धार्मिक परम्पराएँ जुड़ी हैं। हिन्दुओं की मान्यता है कि इसी दिन श्रीराम चौदह वर्ष का वनवासे पूरा करके अयोध्या लौटे थे। उनके आने की खुशी में अयोध्यावासियों ने अपने-अपने घरों में दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन समुद्रमन्थन से धन की देवी लक्ष्मी प्रकट हुई थी। कुछ लोग इस दिन हनुमानजी की जयन्ती बताते हैं। मते चाहे कुछ भी हों, परन्तु आनन्दउल्लास की दृष्टि से यह प्रमुख त्योहार है।

मनाने की विधि:
दीपावली से पहले धनतेरस के दिन गृहिणियाँ नये बर्तन खरीदना शुभ मानती हैं। रूपचौदस को घरों में छोटी दीपावली मनाई जाती है। अमावस्या के दिन दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। इसी दिन लक्ष्मी की पूजा घर-घर में की जाती है। दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। इसके बाद ‘भाई दूज’ का त्योहार मनाते हैं। दीपावली के दिन व्यापारी लोग ‘दवात पूजन करते हैं। रोशनी के साथ ही दीप जलाये जाते हैं, पटाखे छुड़ाए जाते हैं। घर-घर में पकवान बनाये जाते हैं। खाये और खिलाए जाते हैं। इस प्रकार यह त्योहार आनन्द और उत्साह के साथ मनाया जाता

उपसंहार:
हिन्दुओं में मनाए जाने वाले त्योहारों में दीपावली का विशेष महत्त्व है। यह हमारी सामूहिक मंगलेच्छा का प्रतीक है।

14. होली
अथवा
रंगों का त्योहार
अथवा
मेरा प्रिय त्योहार

प्रस्तावना:
भारत में बहुत से त्योहार मनाये जाते हैं। हिन्दुओं के त्योहारों में रक्षाबन्धन, दशहरा, दीपावली और होली प्रमुख त्योहारों के रूप में गिने जाते हैं। इन त्योहारों में होली का अपना महत्त्वपूर्ण स्थान है।

विशिष्ट त्योहार:
वसन्त ऋतु का सर्वप्रथम त्योहार वसन्त पंचमी है। उसके पश्चात् होली आती है। माघ की पूर्णिमा को होलिका-रोपण होता है तथा फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होली मनाई जाती है।

मनाने का तरीका:
इस अवसर पर नये पके हुए अन्न को होली की आग में भूनते हैं और इस भुने हुए अन्न अर्थात् आखतों को आपस में वितरित करते हैं। संस्कृत भाषा में अग्नि में भूने हुए अधपके अन्न को ‘होलक’ कहते हैं। इसी कारण से इस त्योहार को ‘होलिकोत्सव’ या होली कहते हैं। कुछ लोग इस त्योहार का सम्बन्ध प्रह्लाद की बुआ ‘होलिका’ से स्थापित करते हैं। इसके पीछे मनाने की कोई भी बात रही हो लेकिन यह त्योहार प्राचीन काल से मनाया जाता है।

होली खेलना:
होलिका-दहन के बाद लोग धूल, मिट्टी और रंगों से होली खेलते हैं। अपराह्न में स्नान, भोजन इत्यादि करने के बाद सभी लोग नवीन वस्त्र धारण कर एक-दूसरे के यहाँ जाते हैं और मिलकर शुभकामनाएँ व्यक्त करते हैं।

उपसंहार:
देश और स्थान के भेद के अनुसार भारत में इस पर्व को मनाने की विधियों में थोड़ा-बहुत अन्तर है। ब्रज में कई दिनों तक होली खेली जाती है। ब्रज की लट्ठमार होली बहुत प्रसिद्ध है। यह रंगों का मन भावन त्योहार मेल-मिलाप के त्योहार के रूप में प्रसिद्ध है।

15. रक्षाबन्धन

प्रस्तावना:
त्योहार मनाने की हमारी प्राचीन परम्परा है। मनाये जाने वाले त्योहारों में रक्षाबन्धन भी एक बड़ा त्योहार है। प्राचीन काल में इस त्योहार पर ब्राह्मण लोग अपने यजमानों के हाथ में ‘मंगल-सूत्र’ बाँधकर उनके सुख की कामना किया करते थे। बाद में यह त्योहार भाई-बहिन के स्नेह का त्योहार बन गया।

त्योहार मनाने के कारण:
इस त्योहार को मनाने के पीछे अनेक पौराणिक कथाएँ हैं। राजा बलि तथा वामनावतार की कथा इससे जुड़ी हुई मानी जाती है। वैसे तो प्राचीन समय में वैदिक आचार्य अपने शिष्य के हाथ में रक्षा-सूत्र बाँधकर उसे वेद-शास्त्र में पारंगत करते थे। धीरे-धीरे इस त्योहार की परम्परा ने सामाजिक रूप धारण किया। ब्राह्मण अपनी जीविका प्राप्त करने के लिए समर्थ व्यक्तियों के हाथों में ‘रक्षा सूत्र’ बाँधकर अपनी रक्षा की कामना करने लगे।

मनाने का तरीका:
रक्षा बंधन का पावन त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस दिन बहिनें अपने भाई के ललाट पर टीका लगाती है, मिठाई खिलाती हैं और उसकी कलाई पर राखी बाँधती हैं। बदले में भाई बहिन को धन देता है। वास्तव में यह त्योहार भाई-बहिन के पवित्र सम्बन्धों का त्योहार है।

उपसंहार:
रक्षाबन्धन भाई-बहिन का त्यौहार है। आज के दिन भाई-बहिन परस्पर स्नेह-बंधन की परम्परा स्वीकार कर कर्तव्य पालन की प्रतिज्ञा करते हैं।

16. वसन्त पंचमी

प्रस्तावना:
हमारा देश ऋतु प्रधान देश है। यहाँ छः ऋतुएँ होती हैं। दो-दो मासों के क्रम में आने वाली इन ऋतुओं में वसंत ऋतु का अपना विशिष्ट महत्त्व है। इस ऋतु का प्रारम्भ माघ मास में शुक्ल पक्ष की वसंत पंचमी तिथि से होता है।

वसन्त पंचमी का उत्सव:
वसन्त पंचमी को हिन्दू समाज उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस दिन नवजात बालकों को अन्नप्राशन कराया जाता है तथा लड़कियों के नाक-कान छेदनकर्म भी होता है। इस तरह भारतीय संस्कृति में मान्य कुछ संस्कार वसन्त पंचमी को ही किये जाते हैं। इसके साथ ही शिशुओं की शिक्षारम्भ के लिए यही दिन उपयुक्त माना जाता है। इस कारण विद्यालयों में वसन्त पंचमी को सरस्वती-पूजन का कार्यक्रम रखा जाता है। इस दिन सभी शिक्षार्थी नये वस्त्र पहनकर विद्यालय में जाते हैं तथा ‘माँ सरस्वती’ की वन्दना करते हैं। किसान इस दिन जौ की हरी बालें लाकर घर में उसका पूजन भी करते हैं। इस दिन पीले वस्त्र और पीला भोजन करने की भी परम्परा है।

वसन्त पंचमी का महत्त्व:
वसन्त पंचमी का ऋतु परिवर्तन के कारण विशेष महत्त्व है। प्राकृतिक वातावरण में भी इस दिन से मधुरता आ जाती है। इसलिए यह दिन आनन्द और उल्लास को व्यक्त करने वाला दिन है।

उपसंहार:
भारतीय समाज में वसन्त ऋतु का आरम्भ तथा नवीन संवत्सर का सूचक होने से वसन्त पंचमी का दिन बड़ी ही शुभ और कल्याणकारी माना जाता है।

17. गणतन्त्र दिवस (26 जनवरी)
अथवा
राष्ट्रीय पर्व : गणतन्त्र दिवस

प्रस्तावना:
भारतवर्ष त्योहारों के लिए प्रसिद्ध है। अधिकतर त्योहार किसी न किसी धार्मिक उत्सव के लिए होते हैं। जब से हमारा देश स्वतन्त्र हुआ है, तब से 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस और 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। 26 जनवरी के दिन भारत का अपना संविधान लागू हुआ और हमारे देश में लोकतन्त्रात्मक शासन प्रारम्भ हुआ।

मनाने का ढंग:
26 जनवरी के दिन सारे भारत में प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है। इस दिन प्रातः से सायंकाल तक प्रत्येक नगर-कस्बे वे गाँव में उत्सव मनाये जाते हैं। इस दिन देश भर में छुट्टी रहती है। शिक्षण-संस्थानों में। ध्वजारोहण किया जाता है जिसमें सब शिक्षक और विद्यार्थी मिलकर भाग लेते हैं। गाँवों और नगरों में प्रभातफेरियाँ निकाली जाती हैं। राज्यों की राजधानियों में राज्यपाल राष्ट्रीय झण्डे को फहराते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में जनपथ पर यह दिवस बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। सायंकाल में भी अनेक कार्यक्रम होते हैं।

उपसंहार:
इस प्रकार यह राष्ट्रीय पर्व हँसी-खुशी के साथ मनाया जाता है। यह दिवस हमें इस बात की याद दिलाता है कि हमें अपने राष्ट्र की स्वतन्त्रता और लोकतन्त्र की रक्षा करनी चाहिए। हमें अनुशासन में रहकर सभ्य नागरिक की तरह आचरण करना चाहिए।

18. किसी मेले का वर्णन (पुष्कर मेला)
अथवा
मेले का आँखों देखा वर्णन

प्रस्तावना:
राजस्थान में अनेक मेले लगते हैं। इन मेलों में ‘पुष्कर मेले’ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस मेले में दूर-दूर से लोग आते हैं। हमारे विद्यालय में भी पुष्कर मेले के कारण छुट्टी रहती है। इसलिए हमने भी अपने चार मित्रों के साथ मेले में जाने का कार्यक्रम बनाया।

मेले के लिए प्रस्थान:
दूसरे दिन हम चार मित्र भोजन करके एक साथ मेला देखने को रवाना हुए। घर से मेले का स्थान लगभग 3-4 किलोमीटर दूर था, अतः हम लोगों ने पैदल यात्रा करना तय किया।

मार्ग का दृश्य:
मार्ग का दृश्य बड़ा ही मनोहारी था। कुछ लोग ऊँटगाड़ियों में बैठकर जा रहे थे तो कुछ मोटरगाड़ियों पर सवार थे। कोई इक्के पर आसन जमाए हुए था। मार्ग भीड़ से भरा हुआ था। सड़क के दोनों ओर वृक्ष खड़े हुए थे। इस प्रकार दृश्य देखते हुए हम पंचकुण्डों पर पहुँचे।

मेले का आनन्द:
वहाँ पहुँचकर सबने पहले सरोवर के पवित्र जल में स्नान किया। इसके बाद ब्रह्माजी और रंगजी के मन्दिरों के दर्शन किये। फिर हम लोगों ने मेले में घूमना प्रारम्भ किया। सजी दुकानों पर मनभावन चीजों को खाया और खरीददारी की। कुछ देर तक तमाशा देखा। हम लोग शाम को ताँगे द्वारा घर आ गये।

महत्त्व:
पुष्कर हिन्दुओं का पवित्र तीर्थ-स्थान माना जाता है। इसको देखकर हम धन्य हो गये। मेले को देखकर हम सबको खूब आनन्द हुआ। एक दूसरे से परिचय बढ़ा। साथ ही हमारी ज्ञान शक्ति में भी वृद्धि हुई।

19. शिक्षा का अधिकार
प्रस्तावना:
मनुष्य को ज्ञान देकर सामाजिक बनाने, उसे सभ्य नागरिक बनाने की प्रक्रिया का नाम ही शिक्षा है। शिक्षा के द्वारा बालकों के व्यक्तित्व का विकास होता है, उनमें भविष्य में स्वावलम्बी बनाने की योग्यता एवं क्षमता बढ़ती है।

शिक्षा का अधिकार:
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय ही हमारे संविधान में यह निश्चय किया गया कि आगामी दस वर्षों में चौदह वर्ष तक के सभी बालकों को बुनियादी शिक्षा अनिवार्य रूप से दी जायेगी, परन्तु इस व्यवस्था को लागू करने में पूरे साठ साल लग गये और अब नि:शुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के रूप में सामने आया है जो एक अप्रैल, 2010 से पूरे भारत में लागू हो चुका है। इससे शिक्षा के क्षेत्र में कमजोर वर्ग के बालकों को अधिक लाभ मिलेगा।

शिक्षा के अधिकार का स्वरूप:
भारत सरकार द्वारा जारी निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार-अधिनियम में यह व्यवस्था है कि प्रारम्भिक कक्षा से आठवीं कक्षा तक अर्थात् चौदह वर्ष तक प्रत्येक बालक को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार होगा। केन्द्रीय सरकार तथा राज्य सरकारें समस्त व्यय वहन करेंगी। किसी विद्यालय में प्रविष्ट बालक को कक्षा 8 तक किसी कक्षा में नहीं रोका जायेगा, अर्थात् अनुत्तीर्ण न दिखाकर अगली कक्षा में प्रोन्नत करना होगा और प्रारम्भिक शिक्षा पूरी किये बिना विद्यालय से निकाला भी नहीं जायेगा। बालक को शारीरिक दण्ड या मानसिक उत्पीड़न नहीं मिलेगा।

शिक्षा का अधिकार से लाभ-शिक्षा का अधिकार अधिनियम से समाज को अनेक लाभ हैं। इससे

  1. प्रत्येक बालक को प्रारम्भिक शिक्षा निःशुल्क मिलेगी।
  2. समाज में साक्षरता का प्रतिशत बढ़ेगा।
  3. शिक्षा परीक्षोन्मुखी न होकर बुनियादी हो जायेगी।
  4. शिक्षा का व्यवसायीकरण रुक जायेगा।
  5. सभी बालकों के व्यक्तित्व का उचित विकास होगा।
  6. गरीब अभिभावकों को उसका पूरा लाभ मिलेगा।

उपसंहार:
इस प्रकार भारत सरकार द्वारा शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू करने से सभी बालकों के लिए ज्ञान-मन्दिर के द्वार खोल दिये गये हैं। इससे समाज का विकास तथा शिक्षा का उचित प्रसार हो सकेगा तथा साक्षरता की शतप्रतिशत वृद्धि होगी।

20. जीवन की अविस्मरणीय घटना

प्रस्तावना:
मनुष्य जीवन एक नदी के समान है। इसमें कई घटनाएँ तो ऐसी होती रहती हैं जो हमारे मानस पटल पर छायी रहती हैं। यहाँ एक ऐसी ही आँखों देखी घटना का। वर्णन किया जा रहा है जिसको मैं कभी भुला नहीं पाऊँगा।

यात्रा का उद्देश्य एवं कार्यक्रम:
दीपावली की छुट्टियों में। मैं अपने मामा के घर अजमेर गया। सभी से मिला, प्रसन्नता हुई। एक दिन हम सभी ने पुष्कर नहाने की योजना बनाई। मामाजी से आज्ञा लेकर हम पाँच लोग बस द्वारा पुष्कर नहाने के लिए गये।

मनोरम प्रसंग:
पुष्कर पहुँचकर देखा कि वहाँ अपार भीड़ थी। सरोवर घाट पर बच्चे, आदमी, औरतें सभी स्नान कर रहे थे। मैं भी अपने साथियों के साथ नहाने के लिए जल में घुसा। उसी समय मैंने देखा कि एक महिला ने पहले स्नान किया, फिर वह लगभग आठ वर्ष के अपने बालक को नहलाने लगी। बालक अपनी चंचलता के कारण अपनी माता के हाथों से छूट गया और पानी के अन्दर डूबने लगा। यह देखकर उसकी माँ रोने और चिल्लाने लगी।

घटित घटना और अविस्मरणीय दृश्य:
भीड़ एकत्र हो गयी। सभी डूबते बालक पर नजर लगाये हुए थे। काफी समय बाद एक मगर बालक को मुँह में दबाये हुए ऊपर आया फिर पानी में चला गया। मगर के जबड़े में बालक का कटा हुआ पंजा पानी में सूखे पत्ते की तरह तैर रहा था। इस भयानक दृश्य को देखकर खड़ी भीड़ के कलेजे। की धड़कनें बढ़ने लगीं। चारों ओर सन्नाटा छा गया। यह देखकर बालक की माँ रोते-रोते बेहोश हो गयी। मैं इस दृश्य को देखकर गमगीन हो गया और दुःखी मन से अपने साथियों के साथ वापस आ गया।

उपसंहार:
मैंने जीवन में अनेक घटनाएँ देखीं, परन्तु। ऐसी करुण घटना जीवन में अभी तक एक ही बार देखी। जब भी वह दृश्य मेरी आँखों के सामने आ जाता है तो मैं शोक-विह्वल हो जाता हूँ। मेरे जीवन के लिए तो यह एक अविस्मरणीय घटना है, इसे मैं कभी नहीं भूल सकेंगा।

21. दहेज प्रथा अथवा दहेज प्रथा-एक अभिशाप
अथवा
दहेज-एक सामाजिक कलंक
अथवा
दहेज समस्या

प्रस्तावना:
प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ दानों को महत्त्व दिया गया है। इन दानों के अन्तर्गत कन्यादान को भी प्रमुख दान माना जाता था। माता-पिता अपनी स्थिति के आधार पर विवाह के समय दान रूप में उसे आभूषण, वस्त्र व अन्य आवश्यक वस्तुएँ देते थे। यह एक प्रकार से दहेज ही था लेकिन इसमें किसी प्रकार का दबाव नहीं था।

दहेज प्रथा में बदलाव:
प्रारम्भ में दहेज के साथ जो मंगलमय भावना थी, उसमें धीरे-धीरे बुराइयाँ आने लगीं। इसका परिणाम यह हुआ कि कन्यादान माता-पिता के लिए बोझ बन गया। अब तो दहेज प्रथा ने अपना भयंकर रूप धारण कर लिया है। आज स्थिति यह हो रही है कि मुँह माँगा दहेज न मिलने पर दूल्हे सहित बारात लौट जाती है। अतः कन्या-विवाह एक समस्या बन गयी है।

दहेज प्रथा के कुप्रभाव:
इस प्रथा के कारण कन्या व उसके माता-पिता को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। शादी में उचित दहेज न मिलने पर बहू को परेशान किया जाता है। उसके साथ मार-पीट की जाती है। उसको आत्महत्या के लिए मजबूर कर दिया जाता है। इतना ही नहीं, दहेज न दे पाने के कारण लड़कियाँ अविवाहित ही रह जाती हैं।

रोकने के उपाय:
दहेज प्रथा को रोकने के लिए हमारी |सरकार ने दहेज विरोधी कानून भी बना दिया है और इस प्रथा को रोकने के लिए बराबर कोशिश की जा रही है। लेकिन हमारे युवक और युवतियों को भी इसे रोकने के लिए कदम उठाने होंगे। इससे हो सकता है कि आने वाला कल दहेज विरोधी कले हो।।

उपसंहार:
इस समस्या के कारण नारी समाज पर अत्याचार हो रहे हैं। यह हमारे लिए बड़े दु:ख की बात है। हमें दहेज का विरोध करना चाहिए और नारी को पूरा सम्मान दिलाने का प्रयास करना चाहिए।

22. हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव

प्रस्तावना:
वर्तमान काल में विद्यालयों में हर वर्ष वार्षिकोत्सव का आयोजन किया जाता है। वार्षिकोत्सव में अनेक कार्यक्रम रखे जाते हैं, जिनमें भाग लेने से छात्रों में नवीन उत्साह, स्फूर्ति तथा सजगता आ जाती है और उन्हें बहुत कुछ व्यावहारिक शिक्षा मिल जाती है।

उत्सव की तैयारियाँ:
हमारे विद्यालय के प्रधानाध्यापकजी ने प्रार्थना-सभा में घोषणा की कि दो सप्ताह बाद 24 अप्रैल को विद्यालय का वार्षिकोत्सव मनाया जायेगा। इस सूचना से सभी छात्र उत्सव की तैयारी में जुट गये। कुछ छात्र एकांकी की तैयारी करने लगे तो कुछ गायन-वादन और विभिन्न वेश-भूषा की तैयारी में लग गये। विद्यालय के मैदान में एक बड़ा पाण्डाल व मंच बनाया गया और अभिभावकों को निमन्त्रण-पत्र भेजे गये।

उत्सव का आरम्भ एवं कार्यक्रम:
निश्चित दिन को प्रातः नौ बजे से वार्षिकोत्सव प्रारम्भ हुआ। सभी आगन्तुक अपनेअपने स्थान पर बैठ गये। उत्सव के मुख्य अतिथि राज्य शिक्षामन्त्रीजी ठीक समय पर आ गये। उनके आसन ग्रहण करते ही सर्वप्रथम छात्रों ने ‘वन्दे मातरम्’ राष्ट्रगीत गाया। इसके बाद स्वागत गान हुआ और मंच पर बैठे सभी महानुभावों को पुष्पमालाएँ पहनाई गई। इसके बाद प्रधानाध्यापकजी ने स्वागत-भाषण दिया।

विविध कार्यक्रम:
वार्षिकोत्सव के अवसर पर वाद-विवाद प्रतियोगिता, अन्त्याक्षरी एवं एकल गायन प्रतियोगिता प्रारम्भ हुई। इसके बाद लम्बी कूद, ऊँची कूद आदि का आयोजन हुआ। फिर हॉकी एवं फुटबॉल के मैच हुए। दो घण्टे के विश्राम के बाद रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। इन सभी कार्यक्रमों के बाद मुख्य अतिथि का भाषण हुआ और पुरस्कार वितरण किया गया। अन्त में प्रधानाध्यापकजी ने सभी आगन्तुकों को धन्यवाद दिया।

उपसंहार:
प्रत्येक विद्यालय में ऐसे उत्सव मनाये जाते हैं। वार्षिकोत्सव के आयोजन से जहाँ विद्यालय की गतिविधियों |का पता चलता है, वहाँ छात्रों में परस्पर सहयोग, संगठन आदि गुणों का विकास भी होता है।

23. दूरदर्शन से लाभ-हानियाँ

प्रस्तावना:
आज के युग में विज्ञान की आश्चर्यजनक प्रगति में दूरदर्शन भी विज्ञान का अनोखा वरदान है। दूरदर्शन या। टेलीविजन आज मनोरंजन और ज्ञानवर्द्धन का लोकप्रिय माध्यम

दूरदर्शन की उपयोगिता एवं लाभ:
वर्तमान काल में रेडियो की तरह दूरदर्शन से समाचारों का प्रसारण किया जा रहा है। इसमें अनेक कार्यक्रम दिखाये जाते हैं; जैसे समाचार, कृषिदर्शन, नाटक, सुगम संगीत, प्रश्नोत्तरी, चौपाल, महिलाओं के लिए घर-आँगन कार्यक्रम, शिक्षा का प्रसारण, क्रिकेट आदि के प्रमुख मैच, विविध क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ, धारावाहिकों और फिल्मों का प्रसारण आदि। अतः जन-जागरण, ज्ञान-वृद्धि, शिक्षा-प्रसार तथा मनोरंजन आदि की दृष्टि से दूरदर्शन अतीव उपयोगी और लाभप्रद है। इससे व्यावहारिक ज्ञान के साथ सामाजिक चेतना का विकास हो रहा है।

दूरदर्शन का दुष्प्रभाव एवं हानि:
दूरदर्शन का दुष्प्रभाव यह है कि नवयुवक एवं नासमझ बच्चे फिल्मों एवं धारावाहिकों में प्रसारित मारधाड़ के दृश्यों की नकल करने लगे हैं। वे कुसंगति में पड़कर अपना आचरण खराब कर रहे हैं। इससे भारतीय संस्कृति पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। इस प्रकार दूरदर्शन से लाभ की बजाय हानि अधिक हो रही

उपसंहार:
आज के युग में मनोरंजन की दृष्टि से दूरदर्शन का विशेष महत्त्व है। दूरदर्शन से दूर विदेशों के समाचार, मौसम तथा अन्य प्रमुख घटनाओं की जानकारी तुरन्त हो जाती है। इससे जनता के ज्ञान की वृद्धि भी होती है, परन्तु नवयुवकों एवं नवयुवतियों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है।

24. मेरा प्रिय शिक्षक
अथवा
मेरा प्रिय अध्यापक
अथवा
मेरे आदरणीय गुरुजी

प्रस्तावना:
वर्तमान में विद्यालय शिक्षा के केन्द्र हैं जहाँ शिक्षकों द्वारा शिक्षार्थियों को शिक्षा दी जाती है। शिक्षक हमारे सम्माननीय हैं। इसीलिए उन्हें ‘गुरु’ का सम्मान दिया जाता है।

प्रिय शिक्षक:
मैं राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता हूँ। हमारे विद्यालय में ग्यारह अध्यापक हैं। वैसे तो हमारे विद्यालय के सभी अध्यापक विभिन्न विषयों के ज्ञाता तथा परिश्रमी हैं, परन्तु जिस शिक्षक ने मुझे विशेष रूप से प्रभावित किया है, वे हैं श्री ज्ञानप्रकाशजी। ये अपनी अनेक विशेषताओं के कारण हमारे प्रिय शिक्षक हैं।

मेरे प्रिय शिक्षक की विशेषताएँ:
मेरे प्रिय शिक्षक मेरे विषयाध्यापक के साथ-साथ कक्षाध्यापक भी हैं। वे हमारी कक्षा को हिन्दी विषय पढ़ाते हैं। वे एक योग्य और अनुभवी शिक्षक हैं। वे कठिन से कठिन पाठ को भी रुचिकर बनाकर पढ़ाते हैं। उनके पढ़ाने का ढंग इतना सरल और रोचक है। कि सभी शिक्षार्थी उनकी बात को बड़े ध्यान से सुनते और ग्रहण करते हैं। पूरी कक्षा अनुशासित और प्रसन्नचित्त होकर पढ़ती है। केवल पढ़ाने में ही नहीं अपितु अन्य व्यक्तिगत गुणों के कारण भी वह मेरे प्रिय शिक्षक हैं।

वे सादा जीवन उच्च विचार के पोषक हैं। विद्यालय और कक्षा में नियमित रूप से समय पर आना, शिक्षार्थियों के साथ पुत्रवत् स्नेह करना, ईमानदारी और परिश्रम के साथ पढ़ाना, गरीब छात्रों की सहायता करना, हमेशा सत्य बोलना, दूसरों के साथ मधुर व्यवहार करना आदि ऐसे अनेक गुण हैं। जो हमें प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि सभी शिक्षक, शिक्षार्थी यहाँ तक कि प्रधानाध्यापक भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।

उपसंहार:
मेरे प्रिय शिक्षक योग्य, परिश्रमी, स्नेही, कर्मठ, ईमानदार, अनुशासनप्रिय एवं व्यवहारकुशल हैं। पूरा विद्यालय ही नहीं बल्कि पूरा कस्बा उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है।

25. साक्षरता अभियान
प्रस्तावना:
हमारा देश लम्बे समय तक पराधीन रहने के कारण यहाँ समुचित शिक्षा व्यवस्था का विकास नहीं हुआ। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमारी सरकार ने अशिक्षा और निरक्षरता को दूर करने के लिए प्रयास किए हैं। जगह-जगह विद्यालय खोले जा रहे हैं। सभी को अक्षर-ज्ञान हो इसके लिए हमारे देश में सर्व शिक्षा और साक्षरता अभियान चलाया जा रहा है।

साक्षरता अभियान का स्वरूप:
स्वतन्त्रता मिलने के बाद साक्षरता का प्रतिशत बढ़ाने के लिए सबसे पहले बुनियादी शिक्षा प्रारम्भ की गई। इसके बाद सारे देश में प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम राष्ट्रीय नीति के रूप में प्रारम्भ किया गया। इसके लिए जगह-जगह पाठशालाएँ खोली गईं और जनजातियों, हरिजनों तथा कृषक-श्रमिकों को साक्षर बनाने का पूरा प्रयास किया गया। इस तरह के अभियान से निरक्षरता घट रही है। और साक्षरता का प्रतिशत बढ़ रहा है।

साक्षरता अभियान से लाभ:
इस अभियान से जनजागरण हुआ है। हमारे प्रदेश राजस्थान में निरक्षरता का प्रतिशत पहले अधिक था, परन्तु अब साक्षरता का प्रतिशत काफी बढ़ गया है। छोटे गाँवों और ढाणियों में हजारों विद्यालय ‘राजीव गाँधी पाठशाला’ के नाम से खोले गये हैं। उनमें निम्न वर्ग व गरीब लोगों के बच्चों को दिन में भोजन भी दिया जाता है। रात्रि में प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र चलाये जा रहे हैं, इससे भी साक्षरता अभियान काफी सफल हो रहा है।

उपसंहार:
साक्षरता अभियान में धन की कमी एक बड़ी बाधा है, जन-सहयोग से प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार हो रहा है। निरक्षरता हमारे समाज पर एक काला दाग है, उसे साक्षरता अभियान से ही मिटाया जा सकता है।

26. पर्यावरण प्रदूषण
प्रस्तावना:
आज हमारा देश भारत ही नहीं, सारा संसार पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से ग्रस्त है। संसार की प्रत्येक वस्तु किसी-न-किसी रूप में प्रदूषित हो रही है। पानी, हवा, मिट्टी, अनाज आदि सब प्रदूषण से ग्रस्त हो रहे हैं। इस कारण पर्यावरण प्रदूषण मानव-जीवन के लिए एक खतरा बन रहा है।

पर्यावरण प्रदूषण को प्रभाव:
निरन्तर बढ़ रही जनसंख्या, तीव्र गति से शहरों एवं उद्योगों का विकास-विस्तार, प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से दोहन, यातायात के साधनों का विस्तार तथा परमाणु-गैसीय तत्त्वों के कारण धरती पर प्रदूषण फैल रहा है। इससे मानव स्वास्थ्य पर बुरा असर हो रहा है तथा अनेक नये रोग पनप रहे हैं। जल-प्रदूषण से सभी प्राणियों का जीवन खतरे में पड़ रहा है, इससे अनाज और फलसब्जियाँ भी दूषित हो रही हैं। वैज्ञानिकों ने इससे भविष्य में अनेक हानियाँ एवं आशंकाएँ व्यक्त की हैं।

पर्यावरण सन्तुलन के उपाय:
संयुक्त राष्ट्र संघ और विश्व स्वास्थ्य संगठन पर्यावरण संतुलन के अनेक उपाय कर रहे हैं। हमारे देश में भी सरकार ऐसे उपाय कर रही है। इसके लिए वनों की कटाई रोकी जा रही है तथा नये वृक्ष लगाये जा रहे हैं। जलाशयों एवं नदियों को स्वच्छ रखने का अभियान चल रहा है। पर्यावरण सन्तुलन के लिए जनजागरण किया जा रहा है, ताकि पर्यावरण को प्रदूषण से बचाया जा सके।

उपसंहार:
पर्यावरण प्रदूषण एक विकराल समस्या है, पर्यावरण में संतुलन बनाये रखने के लिए सरकार अनेक उपाय कर रही है। पर्यावरण में संतुलन रहने से ही धरती पर खुशहाल जीवन का विकास हो सकता है।

27. आतंकवाद : एक समस्या
प्रस्तावना:
आतंक’ शब्द का अर्थ भय, त्रास या अनिष्ट की पीड़ा होता है। नागरिकों पर हथियारों से हमले करना, उनके बीच भय का वातावरण बनाना आतंकवाद कहलाता है। आज आतंकवाद हमारे देश में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में छाया हुआ है जिससे सभी भयभीत हैं।

भारत में आतंकवाद व उसके दुष्परिणाम:
हमारा देश भी इस विकराल समस्या का सामना कर रहा है। हमारे देश में कश्मीर को लेकर आतंकवाद प्रारम्भ हुआ। उसके बाद आतंकवादियों ने दिल्ली के लाल किला पर, श्रीनगर विधानसभा पर और संसद भवन पर हमला किया। उसके हमले रुके नहीं, उन्होंने गुजरात के ‘अक्षरधाम मन्दिर, जयपुर और मुम्बई में आतंकवादी हमला किया, इतना ही नहीं आतंकवादी सुनियोजित ढंग से लगातार जगह-जगह पर आज भी हमले कर रहे हैं। इन हमलों में वे अत्याधुनिक हथियारों और विस्फोटक सामग्री का उपयोग कर नरसंहार करते हैं। इन हमलों से देश की सम्पत्ति को भी नुकसान हो रहा है, इसके पीछे हमारे पड़ोसी देश का सबसे बड़ा हाथ है।

आतंकवाद विश्वव्यापी समस्या:
आतंकवाद भारत की ही नहीं एक विश्वव्यापी समस्या है। इससे विश्व के कई देश प्रभावित हो रहे हैं। आज की स्थिति यह है कि आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला पड़ोसी देश इस समस्या से खुद घिरा हुआ है।

आतंकवाद को रोकने के उपाय:
आज आतंकवाद के खिलाफ संसार का प्रत्येक देश आवाज उठा रहा है। इस विश्वव्यापी समस्या को सामूहिक रूप से मिलकर कठोरता से सामना करके ही इसे रोका जा सकता है।

उपसंहार:
इस समस्या से निबटने के लिए हमें हमारी सेनाओं को अत्याधुनिक हथियारों से सुसज्जित कर उन्हें पूरी छूट देकर आतंकवादियों का सामना करना होगा। इसके साथ ही गुप्तचर एजेन्सियों को चुस्त और सावधान करना |होगा। तभी आतंकवाद की विकराल समस्या से मुक्ति मिल सकती है।

28. कम्प्यूटर का महत्त्व

प्रस्तावना:
वर्तमान समय में विज्ञान ने अनेक आविष्कार किये हैं। कम्प्यूटर का आविष्कार विज्ञान की सर्वाधिक चमत्कारी घटना है। यह मानव का नया मस्तिष्क है जो तीव्र गणना और स्मरण करने की क्षमता रखता है।

कम्प्यूटर के विविध प्रयोग:
कम्प्यूटर का अनेक कामों में प्रयोग किया जा रहा है। अन्तरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम उग्रहों |के प्रक्षेपण और संचालन में कम्प्यूटर का प्रयोग हो रहा है। बैंकों में सारा हिसाब-किताब इनसे किया जाता है। रेलवे कार्यालयों में टिकट बुकिंग से लेकर रेलगाड़ी के संचालन में इसका प्रयोग हो रहा है। इसी प्रकार वायुयानों के संचालन, दूरसंचार के प्रसार, बड़े उद्योग के संचालन, सामरिक गतिविधियों, मिसाइलों एवं खगोलीय ज्ञान के क्षेत्र में कम्प्यूटर का प्रयोग विशेष रूप से हो रहा है।

कम्प्यूटर का प्रभाव एवं महत्त्व:
वर्तमान समय में कम्प्यूटर का उपयोग प्रत्येक कार्य में हो रही है। यहाँ तक परमाणु हथियारों का निर्माण, संचालन आदि में इनका विशेष महत्त्व है। किताबों, समाचारपत्रों तथा मुद्रण-प्रकाशन के सभी कामों में कम्प्यूटर की उपयोगिता बढ़ रही है। इस प्रकार अब प्रत्येक क्षेत्र में कम्प्यूटर का प्रभाव एवं महत्त्व माना जा रहा है।

उपसंहार:
कम्प्यूटर मानव के शक्तिशाली मस्तिष्क जैसी है। वर्तमान में जीवन के हर क्षेत्र में इसका उपयोग हो रहा है। स्कूलों-कॉलेजों के अलावा अन्य संस्थाओं में भी इसका शिक्षण-प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह सभी के लिए आवश्यक और उपयोगी साधन है।

29. यदि मैं सरपंच होता।
प्रस्तावना:
हमारे देश में प्राचीन समय से पंचायत प्रणाली प्रचलित है। इसमें पंचों को परमेश्वर मानकर उन्हें आदर दिया जाता है। पंचायतों में अन्य सदस्य पंच कहलाते हैं, उनमें मुखिया को सरपंच कहा जाता है।

सरपंच का चयन:
गाँव के सरपंच का चुनाव मतदान प्रक्रिया से होता है। जो आदमी योग्य तथा उस गाँव का निवासी होता है या उस पंचायत क्षेत्र का मतदाता होता है, वह सरपंच पद का उम्मीदवार बन सकता है। मतदान के द्वारा निश्चित समय के लिए वह सरपंच चयनित होता है। सरपंच के सम्मानित पद को देखकर मेरी इच्छा होती है कि मैं सरपंच होता तो कितना अच्छा होता।

कर्तव्यपालन:
यदि मैं सरपंच होता तो मैं इन कर्तव्यों का स्वयं पालन करता

  1. मैं सरपंच होने के नाते सभी लोगों से समानता का व्यवहार करता।।
  2. पंचायत के क्षेत्र में विकास के लिए योजना बनाता तथाजिला विकास अधिकारी से उसे अनुमोदित करवाता।
  3. सरपंच होने के नाते अपने क्षेत्र या गाँव में विद्यालय और राजकीय अस्पताल खुलवाता। पीने के पानी की उचित व्यवस्था करवाता है साथ ही सुलभ शौचालय एवं सफाई आदि सुविधाओं का विकास करवाता।
  4. असहाय, निर्धन लोगों को आर्थिक सहायता दिलवाता। कुटीर उद्योग को बढ़ावा देकर बेरोजगारों को रोजगार दिलवाता।
  5. सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का ईमानदारी के साथ संचालन करवाता।।

उपसंहार:
इस प्रकार यदि मैं सरपंच होता तो जनहित में अनेक ऐसे कार्यक्रम बनाता जिससे गाँव या क्षेत्र विशेष का चहुंमुखी विकास होता और सभी प्रसन्न और खुशहाल जीवन जीते। अतः यदि मैं सरपंच होता तो कितना अच्छा रहता।

30. भारतीय नारी अबला नहीं सबला है

प्रस्तावना:
हमारे देश में प्राचीनकाल से ही नारी को सम्मान दिया जाता रहा है। हमारे यहाँ नारी-नर को लक्ष्मी-नारायण का प्रतिरूप माना गया है। प्राचीन काल में नारी को जो सम्मान प्राप्त रहा, वह मध्यकाल में जाता रहा, परन्तु वर्तमान में नारी वह सम्मान पुनः प्राप्त करने में आगे आ रही है।

नारी का प्राचीन स्वरूप:
वैदिक काल में भारतीय नारी का स्वरूप बहुत ही सम्माननीय था। उस समय नर-नारी को समान अधिकार थे। उच्च शिक्षा प्राप्त करने का उन्हें अधिकार था। गार्गी, मैत्रेयी आदि विदुषी नारियों के उदाहरण इस बात के गवाह हैं।

मध्यकाल में भारतीय नारी:
मध्यकाल में भारतीय नारी की स्थिति में गिरावट आयी। इस काल में उसे स्वतन्त्रता का अधिकार नहीं दिया गया। उसे घर की चहारदीवारी में ही रहने को विवश किया गया। इस तरह उसका जीवन अत्यन्त दयनीय रहा।

वर्तमान युग की नारी:
आजादी प्राप्त करने के बाद भारतीय नारी की शिक्षा एवं रहन-सहन पर ध्यान दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि नारी भी पुरुषों के समान डॉक्टर, वकील, जज, मन्त्री, अधिकारी, समाजसेविका एवं उद्यमी आदि सभी क्षेत्रों में कुशलता से काम कर रही है। वर्तमान में तो भारतीय नारियों ने विज्ञान, राजनीति और अन्य क्षेत्रों में भी अपना वर्चस्व स्थापित किया है। भारतीय सेना में भी नारियों की नियुक्ति होने लगी है।

उपसंहार:
आज आर्थिक बाजारवाद के इस युग में नारी सौन्दर्य प्रदर्शन और विज्ञापन के क्षेत्र में बहुत आगे है फिर भी उसे अपने नारी अस्तित्व की गरिमा को समझना चाहिए और उसे अपनी क्षमताओं के आधार पर यह विचार करना चाहिए कि वह अबला नहीं सबला है।

31. पर्यावरण संरक्षण
अथवा
आम जन में पर्यावरणीय चेतना

प्रस्तावना:
‘पर्यावरण’ शब्द ‘परि + आवरण’ के संयोग से बना है। परि’ का आशय चारों ओर तथा ‘आवरण’ का आशय प्राकृतिक परिवेश है। इस दृष्टि से पर्यावरण में वायु, जल, भूमि, पेड़-पौधे, जीव-जन्तु, मानव और उसकी |विविध गतिविधियों के परिणाम आदि सभी का समावेश होता है।

पर्यावरण संरक्षण की समस्या:
विज्ञान की असीमित प्रगति तथा नये आविष्कारों की स्पर्धा के कारण मानव प्रकृति पर विजय प्राप्त करना चाहता है। इस कारण प्रकृति को सन्तुलन बिगड़ गया है। दूसरी ओर, जनसंख्या की निरन्तर वृद्धि, औद्योगीकरण, शहरीकरण, हरे पेड़ों की कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन, यातायात के साधनों से निकलने वाला धुआँ आदि सब ऐसे कारण हैं। जो पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। ऐसे में पर्यावरण का संरक्षण करना और इसमें सन्तुलन बनाये रखना कठिन कार्य हो गया है।

पर्यावरण संरक्षण का महत्त्व:
पर्यावरण संरक्षण का समस्त प्राणियों के जीवन तथा इस धरती के समस्त प्राकृतिक परिवेश से घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्रदूषण के कारण पूरी पृथ्वी दूषित हो रही है। इसका परिणाम यह दिखाई पड़ने लगा है कि मानव सभ्यता का अन्त निकट भविष्य में होने वाला है।

पर्यावरण संरक्षण के उपाय:
पर्यावरण संरक्षण के लिए। इसे प्रदूषित करने वाले कारणों पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। इसके साथ ही जिन दुष्प्रभावों से हमारा जल, वायु तथा परिवेश दूषित होता है, उन पर तुरन्त नियन्त्रण किया जाना चाहिए। पेड़-पौधों को बहुसंख्या में लगाया जाना चाहिए। नदियों की स्वच्छता, गैसीय पदार्थों का उचित विसर्जन, गन्दे जल-मल का परिशोधन, जनसंख्या नियंत्रण आदि अनेक उपाय किए जा सकते हैं जो पर्यावरण संरक्षण के लिए अति आवश्यक हैं।

उपसंहार:
पर्यावरण संरक्षण किसी एक व्यक्ति या एक देश का काम नहीं है। यह समस्त विश्व के लोगों का कर्तव्य है। इसलिए पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले समस्त कारकों को मिलकर रोके जाने का प्रयास किया जाना चाहिए। तभी पर्यावरण सुरक्षित रह सकता है।

32. योग और स्वास्थ्य
अथवा
योग : स्वास्थ्य की कॅजी

प्रस्तावना:
हमारा देश प्राचीन काल से ही ऋषियों, मुनियों और मनीषियों की भूमि रही है। इसीलिए भारतीय संस्कृति विश्व में अपनी श्रेष्ठताओं और महानताओं के लिए प्रसिद्ध रही है। इसके मूल में सभी सुखी रहे’ की भावना समायी रही है। इसी कारण हमारे ऋषियों और मुनियों ने मानवजीवन को सुखी बनाने के लिए अनेक उपाय किये हैं। इन उपायों में से एक उपाय है योग।

योग से आशय:
‘योग’ शब्द संस्कृत के ‘युज्’ धातु से बना है जिसका शाब्दिक अर्थ है-जोड़ना। किसी वस्तु को अपने से जोड़ना या किसी अच्छे कार्य में अपने आप को। लगाना। एक दृष्टि से मन और शरीर से जो कार्य किया जाए, उसे ही योग कहते हैं। योग का स्वास्थ्य से गहरा सम्बन्ध है। मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए और मानसिक, धार्मिक व आध्यात्मिक उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए योग की कोई न कोई क्रिया रोज पन्द्रह-बीस मिनट नियमित रूप से करनी चाहिए।

वर्तमान में योग और स्वास्थ्य वर्तमान में ‘योग’ शब्द अनजाना नहीं है। क्योंकि जहाँ देखो वहाँ योग का प्रचारप्रसार अनेक माध्यमों से हो रहा है। गाँवों व शहरों में बागों व पार्को में जगह-जगह सुबह-शाम हमेशा सिखाया जा रहा है। स्थिति यह हो रही है कि चारों तरफ आज के जमाने में योग ही योग है क्योंकि आज का मनुष्य अनियमित दिनचर्या के कारण जहाँ अनेक शारीरिक और मानसिक बीमारियों से पीड़ित है, वहीं स्वास्थ्य के प्रति भी सचेत है। योग के क्षेत्र में स्वामी रामदेव का योगदान वर्तमान में अतुलनीय है। वहीं अनेक संस्थाएँ भी खुल गयी हैं जो योग का जगह-जगह प्रशिक्षण देती हैं और लोगों को स्वस्थ और दीर्घ जीवित रहने का सहज उपाय सिखाती

उपसंहार:
योग भारतीय संस्कृति का एक अनुपम उपहार है। योग स्वास्थ्य की कुंजी है। इसके नियमित अभ्यास से मनुष्य स्वस्थ ही नहीं रहता है, बल्कि सौ वर्ष तक जीवित रहने की इच्छा भी पूरी कर लेता है। इसलिए योग स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। इसका प्रचार-प्रसार दिनोंदिन बढ़ता चला जा रहा है।

33. मेरे सपनों का भारत

प्रस्तावना:
मानव विचारशील प्राणी है। उसके विचार केभी अपने तक सीमित हैं तो कभी समाज व राष्ट्र तक फैल जाते हैं। इस दृष्टि से मैं यह सोच करता हूँ कि यदि मेरे सपनों का भारत बन जाए तो कितना ही अच्छा रहे।

मेरे सपनों का भारत मैं सोचता हूँ कि मेरे सपनों के भारत में चारों ओर मित्रता, भाईचारा, स्नेह एवं सदाचार का बोलबाला होगा। मेरी आकांक्षा है कि ऐसा भारत हो जिसमें न तो गरीबी रहे और न आर्थिक विषमता रहे। धन का समान वितरण हो, कहीं किसी का शोषण न हो। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी का अन्त हो। कठोर दण्ड विधान हो। सभी जगह खुशहाली हो। अन्याय, अत्याचार का अन्त हो। हमारा देश सभी क्षेत्रों में सुशासन के साथ उन्नति करे। युवाओं की बेरोजगारी और बढ़ती महँगाई समाप्त हो। भारत सभी क्षेत्रों 1 में प्रगति कर विश्व में अपना गौरव बढ़ाये।

उपसंहार:
मैं अपने भारत को सभी दृष्टियों से महान देखना चाहता हूँ। यह केवल सोचने से ही सम्भव नहीं हो सकता है, करने से ही सम्भव हो सकता है। इसलिए हम सब मिलकर परिश्रम करें, तो वह सुदिन अवश्य जा सकता है।

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